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विजया श्रृंगार ने मोहा श्रद्धालुओं का मनश्मशान स्थित काल भैरव मन्दिर में तंत्रोक्त विधान से हुई पूजा अर्चना

श्री काल भैरव भगवान का विजया श्रृंगार कर 51 दीपों से महाआरती की गई । इस दौरान मन्दिर को फूलों एवं झण्डियों से सुसज्जित किया गया था ।

रिपोर्ट, दिनेश शर्मा न्यूज़ प्लस इन्डिया बहराइच मो,9648944666

बहराइच । पवित्र सावन मास के चतुर्थ रविवार को श्मशान स्थित भगवान महादेव के पूर्ण रूप भूत भावन श्री काल भैरव भगवान का विजया श्रृंगार कर 51 दीपों से महाआरती की गई । इस दौरान मन्दिर को फूलों एवं झण्डियों से सुसज्जित किया गया था । सर्वप्रथम बाबा का भांग से अलौकिक श्रृंगार किया गया । तदोपरान्त अघोरी बाबा भैरव गौरव नाथ के शिष्य शाक्ताचार्य ईशान ने श्री काल भैरव भगवान को तंत्रोक्त विधान से पूजन दिया फिर भैरव बाबा की 51 दीपों से महाआरती की गई । इस दौरान भक्तों ने बाबा के दर्शन कर आशीर्वाद लिया ।
अघोरी बाबा भैरव गौरव जी द्वारा अघोर पीठ के रूप में स्थापित श्री काल भैरव मन्दिर के शाक्ताचार्य ईशान ने बताया कि भैरव का शाब्दिक अर्थ होता है – भय अर्थात भयानक ,रव अर्थात भय से रक्षा करनेवाला शिव के विनाशक स्वरूप से जुड़ा एक उग्र रूप है। त्रिक प्रणाली में भैरव परम ब्रह्म के पर्यायवाची, सर्वोच्च वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। आमतौर पर सनातन धर्म मे भैरव को दंडपाणि भी कहा जाता है जैसा कि वह पापियों को दंड देने के लिए एक छड़ी या डंडा रखते हैं और स्वस्वा का अर्थ है “जिसका वाहन (सवारी) कुत्ता है”। वज्रयान जैन मत में उन्हें बोधिसत्व मंजुश्री का एक उग्र वशीकरण माना जाता है और उन्हें हरुका, वज्रभैरव और यमंतक भी कहा जाता है।
शाक्ताचार्य ईशान ने यह भी बताया कि काल भैरव की उत्पत्ति रात्रि काल में हुई थी, इसीलिए इनकी पूजा रात्रि में करने की विधान है। भैरव जी महाराज हमेशा युद्ध के मैदान में ही रहते हैं। युद्ध मैदान में खाने-पीने की चीजें नहीं मिलती हैं। इसीलिए इस स्वरूप को तामसिक चीजें जैसे मदिरा, राख, तेल, सिंदूर जैसी चढ़ाई जाती है। ये स्वरूप नकारात्मकता का नाश करने वाला होता है। इनका वास श्मशान में बताया गया है।
भैरव जी पर मदिरा चढ़ाने का कारण बताते हुए शाक्ताचार्य ईशान ने बताया कि श्री काल भैरव जी युद्ध के मैदान में ही रहते हैं। आसुरी प्रवृत्तियों से युद्ध करते हैं, इस कारण इन्हें तामसिक चीजें अर्पित की जाती हैं। मदिरा चढ़ाने का भाव यह है कि हमें अपनी सभी बुराइयों, नशा करने की आदत को भगवान के सामने छोड़ने का संकल्प लें। काल भैरव को मदिरा चढ़ाकर प्रण लेना चाहिए कि अब से हम नशा नहीं करेंगे।
जहां भैरव जी का उग्र स्वरूप दुष्ट और पापियों के लिए काल है, वही अपने भक्तों के लिए परम दयालु भी हैं।भैरव जी के पूजन से भक्त निर्भय होते हैं उनके कष्टों का शीघ्र क्षरण कर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।कुंडली में शनि की साढ़ेसाती ,राहु केतु आदि दोष भैरव जी के प्रत्येक रविवार या किसी भी मास की अष्टमी को दर्शन करने मात्र से ही दूर हो जाते हैं।भैरव मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं एवं भगवान को सिंदूर चढ़ाएं। भैरव जी को शिवजी का क्रोधित स्वरूप माना जाता है। इसीलिए शिवजी के भक्तों को अधार्मिक कर्मों से बचना चाहिए।
श्री काल भैरव मां भगवती के साथ उनके कोतवाल के रूप में सदैव रहते हैं इसलिए देवी पूजन से पूर्व भैरव जी की पूजा का विधान है ।

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